स्तोत्र और चालीसा पर वापस जाएं
चालीसाGayatriSurya

गायत्री चालीसा

गायत्री चालीसा वेदमाता गायत्री को समर्पित 40 छंदों का स्तोत्र है। वैदिक ज्योतिष में यह सूर्य उपाय, आध्यात्मिक ज्ञान और सूर्य महादशा के लिए सर्वोत्तम पाठ माना जाता है।

गायत्री चालीसा

दोहा

ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचण्ड ॥

Hreem Shreem Kleem Medha Prabha | Jeevan Jyoti Prachand ||

ह्रीं श्रीं क्लीं — मेधा प्रभा और प्रचंड जीवन ज्योति।

दोहा

शांति क्रांति जागृति प्रगति रचना शक्ति अखण्ड ॥

Shanti Kranti Jagruti Pragati | Rachana Shakti Akhand ||

शांति, क्रांति, जागृति, प्रगति — अखंड रचना शक्ति।

दोहा

जगत जननि मंगल करनि गायत्री सुखधाम ॥

Jagat Janani Mangal Karani | Gayatri Sukhadham ||

जगत जननी, मंगल करनी, गायत्री सुखधाम।

दोहा

प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम ॥

Pranavon Savitri Swadha | Swaha Puran Kam ||

प्रणव, सावित्री, स्वधा, स्वाहा — पूरण काम।

चौपाई 1

भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी गायत्री नित कलिमल दहनी ॥

Bhurbhuvah Swah Om Yut Janani | Gayatri Nit Kalimal Dahani ||

ॐ युक्त जननी; कलियुग के पाप दहने वाली गायत्री।

चौपाई 2

अक्षर चौबिस परम पुनीता इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता ॥

Akshar Chaubis Param Punita | Inamen Basen Shastra Shruti Gita ||

चौबीस अक्षर परम पवित्र; शास्त्र, श्रुति, गीता निवास।

चौपाई 3

शाश्वत सतोगुणी सतरूपा सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥

Shashwat Satoguni Sataroopa | Satya Sanatan Sudha Anoopa ||

शाश्वत सतोगुणी सतरूपा; सनातन सुधा अनूप।

चौपाई 4

हंसारूढ़ सिताम्बर धारी स्वर्णकांति शुचि गगन बिहारी ॥

Hansarudh Sitambar Dhari | Swarnakanti Shuchi Gagan Bihari ||

हंसारूढ़, सिताम्बर, स्वर्णकांति, गगन विहारिणी।

चौपाई 5

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥

Pustak Pushp Kamandalu Mala | Shubhra Varn Tanu Nayan Vishala ||

पुस्तक, पुष्प, कमण्डलु, माला; शुभ्र वर्ण, विशाल नेत्र।

चौपाई 6

ध्यान धरत पुलकित हिय होई सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई ॥

Dhyan Dharat Pulakit Hiy Hoi | Sukh Upajat Dukh Durmati Khoi ||

ध्यान से हृदय पुलकित; सुख उपजे, दुःख-दुर्मति खोए।

चौपाई 7

कामधेनु तुम सुर तरु छाया निराकार की अद्भुत माया ॥

Kamdhenu Tum Sur Taru Chhaya | Nirakar Ki Adbhut Maya ||

कामधेनु, कल्पतरु छाया; निराकार अद्भुत माया।

चौपाई 8

तुम्हरी शरण गहै जो कोई तरै सकल संकट सों सोई ॥

Tumhari Sharan Gahai Jo Koi | Tarai Sakal Sankat Son Soi ||

शरण आने वाला सकल संकट से तर जाता है।

चौपाई 9

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥

Saraswati Lakshmi Tum Kali | Dipai Tumhari Jyoti Nirali ||

सरस्वती, लक्ष्मी, काली — अद्वितीय ज्योति।

चौपाई 10

तुम्हरी महिमा पार न पावैं जो शारद शत मुख गुण गावैं ॥

Tumhari Mahima Par Na Paven | Jo Sharad Shat Mukh Gun Gaven ||

शत मुख शारदा भी महिमा का पार न पाएँ।

चौपाई 11

चार वेद की मातु पुनीता तुम ब्रह्माणी गौरी सीता ॥

Char Ved Ki Matu Punita | Tum Brahmani Gauri Sita ||

चार वेदों की माता; ब्रह्माणी, गौरी, सीता।

चौपाई 12

महामंत्र जितने जग माहीं कोऊ गायत्री सम नाहीं ॥

Mahamantra Jitne Jag Mahin | Kou Gayatri Sam Nahin ||

जग में गायत्री सम कोई मंत्र नहीं।

चौपाई 13

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै आलस पाप अविद्या नासै ॥

Sumirat Hiy Mein Gyan Prakasai | Alas Pap Avidya Nasai ||

सुमिरन से ज्ञान प्रकाश; आलस्य, पाप, अविद्या नाश।

चौपाई 14

सृष्टि बीज जग जननि भवानी कालरात्रि वरदा कल्याणी ॥

Srishti Beej Jag Janani Bhavani | Kalaratri Varada Kalyani ||

सृष्टि बीज, जग जननी, कालरात्रि, कल्याणी।

चौपाई 15

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते तुम सों पावें सुरता तेते ॥

Brahma Vishnu Rudra Sur Jete | Tum Son Paven Surata Tete ||

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र सब तुमसे सुरति पाते हैं।

चौपाई 16

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥

Tum Bhaktan Ki Bhakt Tumhare | Jananihin Putra Pran Te Pyare ||

भक्तों की भक्त; प्राण से प्यारी।

चौपाई 17

महिमा अपरम्पार तुम्हारी जय जय जय त्रिपदा भयहारी ॥

Mahima Aparampar Tumhari | Jai Jai Jai Tripada Bhayahari ||

अपरिमित महिमा; त्रिपदा भयहारी की जय।

चौपाई 18

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना तुम सम अधिक न जग में आना ॥

Purit Sakal Gyan Vijyana | Tum Sam Adhik Na Jag Mein Ana ||

सकल ज्ञान-विज्ञान पूर्ण; जग में तुमसे बढ़कर कोई नहीं।

चौपाई 19

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेशा ॥

Tumahin Jani Kachhu Rahai Na Shesha | Tumahin Pay Kachhu Rahai Na Klesha ||

तुम्हें जानने से शेष न रहे; पाने से क्लेश न रहे।

चौपाई 20

जानत तुमहिं तुमहिं है जाई पारस परसि कुधातु सुहाई ॥

Janat Tumahin Tumahin Hai Jai | Paras Parasi Kudhatu Suhai ||

तुम्हें जानना तुम्हीं हो जाना; पारस की भाँति रूपांतर।

चौपाई 21

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई माता तुम सब ठौर समाई ॥

Tumhari Shakti Dipai Sab Thai | Mata Tum Sab Thaur Samai ||

शक्ति सब ठौर दीप्त; सब स्थान में समाई।

चौपाई 22

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ॥

Grah Nakshatra Brahmand Ghanere | Sab Gativan Tumhare Prere ||

ग्रह, नक्षत्र, ब्रह्माण्ड — सब तुम्हारे प्रेरणा से गतिमान।

चौपाई 23

सकल सृष्टि की प्राण विधाता पालक पोषक नाशक त्राता ॥

Sakal Srishti Ki Pran Vidhata | Palak Poshak Nashak Trata ||

सृष्टि के प्राणविधाता, पालक, पोषक, नाशक, त्राता।

चौपाई 24

मातेश्वरी दया व्रत धारी तुम सन तरे पातकी भारी ॥

Mateshwari Daya Vrat Dhari | Tum San Tare Pataki Bhari ||

दया व्रतधारिणी; पातकी भी तर जाते हैं।

चौपाई 25

जा पर कृपा तुम्हारी होई तापर कृपा करें सब कोई ॥

Ja Par Kripa Tumhari Hoi | Tapar Kripa Karen Sab Koi ||

जिस पर तुम्हारी कृपा, सब उस पर कृपा करें।

चौपाई 26

मन्द बुद्धि ते बुद्धि बल पावें रोगी रोग रहित हो जावें ॥

Mand Buddhi Te Buddhi Bal Paven | Rogi Rog Rahit Ho Javen ||

मंद बुद्धि को बल; रोगी रोगमुक्त।

चौपाई 27

दारिद्र मिटै कटै सब पीरा नाशै दुःख हरै भव भीरा ॥

Daridra Mitai Katai Sab Pira | Nashai Dukh Harai Bhav Bhira ||

दारिद्र्य मिटे, पीरा कटे; दुःख-भवभय नाश।

चौपाई 28

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी नासै गायत्री भय हारी ॥

Grih Klesh Chit Chinta Bhari | Nashai Gayatri Bhay Hari ||

गृहक्लेश, चिंता नाश; गायत्री भयहारिणी।

चौपाई 29

संतति हीन सुसंतति पावें सुख संपत्ति युत मोद मनावें ॥

Santati Heen Susantati Paven | Sukh Sampatti Yut Mod Manaven ||

संततिहीन को सुसंतति; सुख-संपत्ति से आनंद।

चौपाई 30

भूत पिशाच सबै भय खावें यम के दूत निकट नहिं आवें ॥

Bhoot Pishach Sabai Bhay Khaven | Yam Ke Doot Nikat Nahin Aaven ||

भूत-पिशाच भय खाएँ; यमदूत निकट न आएँ।

चौपाई 31

जो सधवा सुमिरें चित लाई अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥

Jo Sadhava Sumiren Chit Lai | Achhat Suhag Sada Sukhadai ||

सधवा सुमिरें तो अच्छुत सुहाग सुखदायी।

चौपाई 32

घर वर सुखप्रद लहैं कुमारी विधवा रहें सत्यव्रत धारी ॥

Ghar Var Sukhprad Lahain Kumari | Vidhava Rahen Satyavrat Dhari ||

कुमारी को सुखप्रद वर; विधवा सत्यव्रत धारिणी।

चौपाई 33

जयति जयति जगदम्ब भवानी तुम सम और दयालु न दानी ॥

Jayati Jayati Jagdamb Bhavani | Tum Sam Aur Dayalu Na Dani ||

जय जगदम्ब भवानी; तुमसे दयालु कोई नहीं।

चौपाई 34

जो सद्गुरु सों दीक्षा पावें सो साधन को सफल बनावें ॥

Jo Sadguru Son Diksha Paven | So Sadhan Ko Saphal Banaven ||

सद्गुरु दीक्षा से साधन सफल।

चौपाई 35

सुमिरन करें सुरुचि बड़भागी लहै मनोरथ गृही विरागी ॥

Sumiran Karen Suruchi Badbhagi | Lahai Manorath Grihi Viragi ||

सुरुचि भागी सुमिरन से मनोरथ सिद्ध।

चौपाई 36

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता सब समर्थ गायत्री माता ॥

Asht Siddhi Navanidhi Ki Data | Sab Samarth Gayatri Mata ||

अष्ट सिद्धि, नवनिधि दाता; सर्वसमर्थ गायत्री माता।

चौपाई 37

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी आरत अर्थी चिन्तित भोगी ॥

Rishi Muni Yati Tapasvi Yogi | Arat Arthi Chintit Bhogi ||

ऋषि, मुनि, यती, योगी, आर्त, अर्थी, भोगी — सबके कल्याण।

चौपाई 38

जो जो शरण तुम्हारी आवें सो सो मन वांछित फल पावें ॥

Jo Jo Sharan Tumhari Aaven | So So Man Vanchhit Phal Paven ||

शरण आने वाले मनोवांछित फल पाएँ।

चौपाई 39

बल बुद्धि विद्या शील स्वभाऊ धन वैभव यश तेज उछाऊ ॥

Bal Buddhi Vidya Sheel Svabhau | Dhan Vaibhav Yash Tej Uchhau ||

बल, बुद्धि, विद्या, शील, धन, वैभव, यश, तेज।

चौपाई 40

सकल बढ़ें उपजे सुख नाना जो यह पाठ करै धरि ध्याना ॥

Sakal Badhen Upaje Sukh Nana | Jo Yah Path Karai Dhari Dhyana ||

ध्यानपूर्वक पाठ करने से सकल वृद्धि और सुख।

दोहा

यह चालीसा भक्तियुत पाठ करे जो कोय ॥

Yah Chalisa Bhaktiyut | Path Kare Jo Koy ||

जो भक्तियुत इस चालीसा का पाठ करे...

दोहा

तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥

Tapar Kripa Prasannata | Gayatri Ki Hoy ||

...उस पर गायत्री की कृपा और प्रसन्नता होती है।

गायत्री चालीसा के बारे में

गायत्री चालीसा हिंदू परंपरा का अत्यंत पवित्र स्तोत्र है, जो माँ गायत्री को समर्पित है। इसके नियमित पाठ से भक्तों को दिव्य कृपा, मानसिक स्थिरता और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा प्राप्त होती है।

  • सूर्य ग्रह उपाय: वैदिक ज्योतिष में इस पाठ को सूर्य महादशा, अंतर्दशा या कठिन गोचर के दौरान ग्रह ऊर्जा को संतुलित करने के लिए सुझाया जाता है।

पाठ के लाभ

  • आध्यात्मिक ज्ञान और वैदिक बुद्धि
  • कमजोर सूर्य, सूर्य महादशा में राहत
  • मानसिक स्पष्टता, साहस और अज्ञान नाश
  • नकारात्मक ग्रह प्रभाव से सुरक्षा

शुभ समय और विधि

रविवार, गायत्री जयंती या प्रतिदिन संध्या के बाद सूर्योदय पर पाठ करें। पूर्व मुख कर घी का दीप जलाएँ।

ज्योतिषीय महत्व

नियमित पाठ मन को धार्मिक अनुशासन से जोड़ता है — जो सभी वैदिक उपायों की नींव है। भय के बजाय ईमानदार आचरण, सेवा और निरंतरता के साथ इसका अभ्यास करें।

संबंधित स्तोत्र और पाठ

स्तोत्रSuryaSurya

आदित्य हृदयम्

वाल्मीकि रामायण युद्ध काण्ड का 31 श्लोकीय सूर्य स्तोत्र, जो अगस्त्य ऋषि ने रावण युद्ध से पूर्व राम को दिया। वैदिक ज्योतिष में विजय, स्वास्थ्य और सूर्य महादशा का सर्वोत्तम उपाय।

पाठ करें
मंत्रSavitri (Surya)Surya

गायत्री मंत्र (व्याहृतियों सहित)

ऋग्वेद ३.६२.१० का पूर्ण गायत्री मंत्र — ॐ और तीन व्याहृतियों (भूः भुवः स्वः) सहित। ज्ञान, स्पष्टता और आध्यात्मिक प्रकाश के लिए सर्वोच्च 24-अक्षर वैदिक मंत्र। दैनिक संध्या और [सूर्य उपासना](/hi/blog/what-is-saturn-in-vedic-astrology) के लिए आदर्श।

पाठ करें
स्तोत्रRamaSurya

राम रक्षा स्तोत्र

बुधकौशिक का अड़तीस श्लोकीय राम रक्षा स्तोत्र, शिव के स्वप्न में प्रदत्त। दिव्य रक्षा, अभय और आध्यात्मिक पुण्य के लिए शक्तिशाली कवच स्तोत्र।

पाठ करें

अगला कदम

इसे अपनी कुंडली पर लागू करें