मार्कण्डेय महामृत्युंजय स्तोत्र (13 श्लोक)
मार्कण्डेय ऋषि का 13-श्लोक महामृत्युंजय स्तोत्र — 'रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं' से आरंभ। शिव की कृपा से मृत्यु पर विजय पाने वाले मार्कण्डेय का रचना। [महामृत्युंजय मंत्र](/hi/stotras/maha-mrityunjaya-mantra) के साथ जप करें।

चौपाई 1
रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकण्ठमुमापतिम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Rudram Pashupatim Sthanum Neelakantham Umapatim | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
रुद्र, पशुपति, अचल स्थाणु, नीलकण्ठ, उमा के पति — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 2
नीलकण्ठं कालमूर्त्तिं कालज्ञं कालनाशनम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Neelakantham Kalamurttim Kalajnyam Kalanashanam | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
नीलकण्ठ, काल के स्वरूप, काल के ज्ञाता, काल के विनाशक — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 3
नीलकण्ठं विरूपाक्षं निर्मलं निलयप्रदम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Neelakantham Virupaksham Nirmalam Nilayapradam | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
नीलकण्ठ, विरूपाक्ष, निर्मल, निलय प्रदाता — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 4
वामदेवं महादेवं लोकनाथं जगद्गुरुम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Vamadevam Mahadevam Lokanatham Jagadgurum | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
वामदेव, महादेव, लोकनाथ, जगद्गुरु — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 5
देवदेवं जगन्नाथं देवेशं वृषभध्वजम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Devadevam Jagannatham Devesham Vrishabhadhwajam | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
देवों के देव, जगन्नाथ, देवेश, वृषभध्वज — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 6
त्र्यक्षं चतुर्भुजं शान्तं जटामकुटधारिणम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Tryaksham Chaturbhujam Shantam Jatamakutadharinam | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
त्रिनेत्र, चतुर्भुज, शांत, जटामुकुटधारी — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 7
भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गं नागाभरणभूषितम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Bhasmoddhulitasarvangam Nagabharanabhooshitam | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
भस्म से सने सर्वांग, नागाभरण से विभूषित — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 8
अनन्तमव्ययं शान्तं अक्षमालाधरं हरम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Anantamavyayam Shantam Akshamala Dharam Haram | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
अनंत, अव्यय, शांत, अक्षमालाधारी हर — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 9
आनन्दं परमं नित्यं कैवल्यपददायिनम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Anandam Paramam Nityam Kaivalyapadadayinam | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
परमानंद, नित्य, कैवल्यपद दाता — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 10
अर्द्धनारीश्वरं देवं पार्वतीप्राणनायकम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Arddhanarishvaram Devam Parvati Prananayakam | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
अर्धनारीश्वर, पार्वती के प्राणनायक — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 11
प्रलयस्थितिकर्त्तारमादिकर्त्तारमीश्वरम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Pralayasthiti Karttaram Adikarttaram Ishvaram | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
प्रलय, स्थिति और सृष्टि के कर्ता, आदिकर्ता ईश्वर — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 12
व्योमकेशं विरूपाक्षं चन्द्रार्द्धकृतशेखरम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Vyomakesham Virupaksham Chandrarddha Kritshekharam | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
व्योमकेश, विरूपाक्ष, चंद्रार्धकृतशेखर — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
चौपाई 13
गङ्गाधरं शशिधरं शङ्करं शूलपाणिनम् । नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥
Gangadharan Shashidharan Shankaram Shoolapaninam | Namami Shirasa Devam Kim No Mrityuh Karishyati ||
गंगाधर, शशिधर, शंकर, शूलपाणि — मैं भगवान को शिर से नमन करता हूँ — मृत्यु हमारा क्या कर सकती है?
महामृत्युंजय स्तोत्र (मार्कण्डेय) के बारे में
महामृत्युंजय स्तोत्र (मार्कण्डेय) हिंदू परंपरा का अत्यंत पवित्र स्तोत्र है, जो मृत्युञ्जय रूप में भगवान शिव को समर्पित है। इसके नियमित पाठ से भक्तों को दिव्य कृपा, मानसिक स्थिरता और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा प्राप्त होती है।
पाठ के लाभ
- मार्कण्डेय ऋषि का 13-श्लोक स्तोत्र — जिन्होंने शिव भक्ति से यम पर विजय पाई
- प्रत्येक श्लोक 'किं नो मृत्युः करिष्यति' से समाप्त — मृत्यु हमारा क्या करेगी?
- एक-श्लोक महामृत्युंजय मंत्र (ऋग्वेद ७.५९.१२) से भिन्न
- अपमृत्यु रक्षा, रोग निवारण और दीर्घायु के लिए पारंपरिक पाठ
शुभ समय और विधि
सोमवार, महाशिवरात्रि, या श्रावण सोमवार को 13 श्लोक एक या तीन बार पढ़ें। उत्तर दिशा की ओर मुख करें। शिवलिंग पर बिल्वपत्र और जल चढ़ाएँ। 41 दिनों तक दैनिक पाठ के साथ 108 मंत्र जप करें।
ज्योतिषीय महत्व
नियमित पाठ मन को धार्मिक अनुशासन से जोड़ता है — जो सभी वैदिक उपायों की नींव है। भय के बजाय ईमानदार आचरण, सेवा और निरंतरता के साथ इसका अभ्यास करें।
मंत्र बनाम स्तोत्र: महामृत्युंजय मंत्र गिनती वाले जप के लिए है। यह स्तोत्र निरंतर स्तुति है — पाठ के बाद 108 बार मंत्र जप करें।