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स्तोत्रShaniShani
अंतिम अपडेट:द्वारा Rahul Arya

दशरथ कृत शनि स्तोत्रम् हिंदी लिरिक्स — Shani स्तोत्र का पाठ

राजा दशरथ ने शनि देव को प्रसन्न करने के लिए यह ग्यारह श्लोकीय स्तोत्र रचा था। साढ़े साती और शनि महादशा में शनिवार को पाठ किया जाता है — वैदिक ज्योतिष का सर्वाधिक विश्वसनीय शनि उपाय।

दशरथ कृत शनि स्तोत्रम् — Shani Vedic Stotra with lyrics, meaning and benefits

चौपाई 1

कोणोऽन्तको रौद्रयमोऽथ बभ्रुः कृष्णः शनिः पिंगलमन्दसौरिः। नित्यं स्मृतो यो हरते च पीडां तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

Kono-antako raudrayamo-tha babhruh krishnah shanih pingalamandasaurih. Nityam smrito yo harate cha pidam tasmai namah shriravinandanaya.

कोण, अन्तक, रौद्र, यम, बभ्रु, कृष्ण, शनि, पिङ्गल, मन्द, सौरि — रवि-नन्दन को नमस्कार, जो स्मरण मात्र से पीड़ा हरते हैं।

चौपाई 2

सुरासुराः किंपुरुषोरगेन्द्रा गन्धर्वविद्याधरपन्नगाश्च। पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

Surasurah kimpurushoragendra gandharvavidyadharapannagashcha. Pidyanti sarve vishamasthitena tasmai namah shriravinandanaya.

देव, असुर, किंपुरुष, नागेन्द्र, गन्धर्व, विद्याधर, पन्नग — सभी विषम स्थिति में पीड़ित होते हैं। रवि-नन्दन को नमस्कार।

चौपाई 3

नरा नरेन्द्राः पशवो मृगेन्द्रा वन्याश्च ये कीटपतंगभृङ्गाः। पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

Nara narendrah pashavo mrigendra vanyashcha ye kitapatangabhrungah. Pidyanti sarve vishamasthitena tasmai namah shriravinandanaya.

मनुष्य, राजा, पशु, मृगेन्द्र, वनचर, कीट, पतंग, भृंग — सभी विषम शनि से पीड़ित। रवि-नन्दन को नमस्कार।

चौपाई 4

देशाश्च दुर्गाणि वनानि यत्र सेनानिवेशाः पुरपत्तनानि। पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

Deshashcha durgani vanani yatra senaniveshah purapattanani. Pidyanti sarve vishamasthitena tasmai namah shriravinandanaya.

देश, दुर्ग, वन, सेना-निवेश, नगर — सभी विषम शनि से पीड़ित। रवि-नन्दन को नमस्कार।

चौपाई 5

तिलैर्यवैर्माषगुडान्नदानैर्लोहेन नीलाम्बरदानतो वा। प्रीणाति मन्त्रैर्निजवासरे च तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

Tilairyavairmashagudannadanaairlohena nilambaradanato va. Prinati mantrairnijavasare cha tasmai namah shriravinandanaya.

तिल, यव, माष, गुड, अन्न, लोह, नील वस्त्र दान और शनिवार के मंत्र से प्रसन्न होते हैं। रवि-नन्दन को नमस्कार।

चौपाई 6

प्रयागकूले यमुनातटे च सरस्वतीपुण्यजले गुहायाम्। यो योगिनां ध्यानगतोऽपि सूक्ष्मस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

Prayagakule yamunatate cha sarasvatipunyajale guhayam. Yo yoginam dhyanagato-api sukshmastasmai namah shriravinandanaya.

प्रयाग, यमुना तट, सरस्वती जल, गुहा में योगियों के ध्यान में सूक्ष्म रूप से विराजमान — रवि-नन्दन को नमस्कार।

चौपाई 7

अन्यप्रदेशात्स्वगृहं प्रविष्टस्तदीयवारे स नरः सुखी स्यात्। गृहाद् गतो यो न पुनः प्रयाति तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

Anyapradeshat svagriham pravishtastadiyavare sa narah sukhi syat. Grihad gato yo na punah prayati tasmai namah shriravinandanaya.

शनिवार को घर लौटने वाला सुखी रहता है; उस दिन घर छोड़ने वाला वापस नहीं आता। रवि-नन्दन को नमस्कार।

चौपाई 8

स्रष्टा स्वयंभूर्भुवनत्रयस्य त्राता हरीशो हरते पिनाकी। एकस्त्रिधा ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय॥

Srashta svayambhur bhuvanatrayasya trata harisho harate pinaki. Ekastridha rigyajussamamurtistasmai namah shriravinandanaya.

स्रष्टा ब्रह्मा, रक्षक हरि, पिनाकी शिव — तीनों वेद-मूर्ति शनि को नमस्कार करते हैं। रवि-नन्दन को नमस्कार।

चौपाई 9

शन्यष्टकं यः प्रयतः प्रभाते नित्यं सुपुत्रैः पशुबान्धवैश्च। पठेत्तु सौख्यं भुवि भोगयुक्तः प्राप्नोति निर्वाणपदं तदन्ते॥

Shanyashtakam yah prayatah prabhate nityam suputraih pashubandhavaishcha. Pathettu saukhyam bhuvi bhogayuktah prapnoti nirvanapadam tadante.

जो प्रातः काल सुपुत्र, पशु, बान्धवों सहित यह शनि अष्टक पढ़ता है, सौभाग्य पाकर अन्त में मोक्ष पाता है।

चौपाई 10

कोणस्थः पिङ्गलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः। सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः॥

Konasthah pingalo babhruh krishno raudro-antako yamah. Saurih shanaishcharo mandah pippaladena samstutah.

कोणस्थ, पिङ्गल, बभ्रु, कृष्ण, रौद्र, अन्तक, यम, सौरि, शनैश्चर, मन्द — पिप्पलाद द्वारा संस्तुत।

चौपाई 11

एतानि दश नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्। शनैश्चरकृता पीडा न कदाचिद्भविष्यति॥

Etani dasha namani pratarutthaya yah pathet. Shanaishcharakruta pida na kadachid bhavishyati.

जो प्रातः उठकर ये दस नाम पढ़ता है, शनैश्चर की पीड़ा कभी नहीं होगी।

दशरथ कृत शनि स्तोत्रम् के बारे में

दशरथ कृत शनि स्तोत्रम् हिंदू परंपरा का अत्यंत पवित्र स्तोत्र है, जो शनि देव को समर्पित है। इसके नियमित पाठ से भक्तों को दिव्य कृपा, मानसिक स्थिरता और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा प्राप्त होती है।

  • शनि ग्रह उपाय: वैदिक ज्योतिष में इस पाठ को शनि महादशा, अंतर्दशा या कठिन गोचर के दौरान ग्रह ऊर्जा को संतुलित करने के लिए सुझाया जाता है।

पाठ के लाभ

  • शनिवार पाठ से साढ़े साती, ढैया और शनि पीड़ा में राहत
  • ब्रह्माण्ड पुराण परंपरा में राजा दशरथ की रचना
  • दस पवित्र नामों का प्रातःकाल पाठ
  • तिल, लोह और नील वस्त्र दान के साथ शनि प्रसन्नि

शुभ समय और विधि

शनिवार को प्रातः स्नान के बाद पढ़ें, शनि होर में सर्वोत्तम। रुद्राक्ष या काले तिल की माला से ग्यारह श्लोक जपें। शनि देव के सामने तिल का तेल दीपक जलाएँ। शनि उपाय गाइड से जोड़ें।

ज्योतिषीय महत्व

नियमित पाठ मन को धार्मिक अनुशासन से जोड़ता है — जो सभी वैदिक उपायों की नींव है। भय के बजाय ईमानदार आचरण, सेवा और निरंतरता के साथ इसका अभ्यास करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दशरथ कृत शनि स्तोत्रम् क्या है?

राजा दशरथ ने शनि देव को प्रसन्न करने के लिए यह ग्यारह श्लोकीय स्तोत्र रचा था। साढ़े साती और शनि महादशा में शनिवार को पाठ किया जाता है — वैदिक ज्योतिष का सर्वाधिक विश्वसनीय शनि उपाय।

दशरथ कृत शनि स्तोत्रम् का पाठ हिंदी और अंग्रेज़ी में कहाँ पढ़ें?

इस पृष्ठ पर दशरथ कृत शनि स्तोत्रम् का पूरा पाठ मूल हिंदी (देवनागरी) में, अंग्रेज़ी लिप्यंतरण और अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ दिया गया है। संयुक्त दृश्य में तीनों साथ दिखते हैं, ताकि आप पढ़ सकें, याद कर सकें और पाठ कर सकें।

दशरथ कृत शनि स्तोत्रम् किसे समर्पित है?

दशरथ कृत शनि स्तोत्रम् Shani को समर्पित है। वैदिक ज्योतिष में इसे Shani से भी जोड़ा जाता है।

मेरी कुंडली के लिए कौन-सा स्तोत्र उचित है?

स्तोत्र और मंत्र पारंपरिक रूप से कुंडली और चल रही दशा के अनुसार चुने जाते हैं। राहुल आर्य के साथ व्यक्तिगत परामर्श में आपकी कुंडली देखकर बताया जाता है कि कौन-सा पाठ आपके लिए उपयुक्त है।

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